Hi 👋 friends
आज की मेरी कविता लोगो के स्वभाव पर आधारित है। जहा लोग पल - पल मे अपने स्वभाव को बदलते रहते है।उसके साथ ही अहंकार का चादर ओढ़ कर अपनी पैर के नीचे की चादर को भूल जाते है। और उसी मे मग्न रहते है,तभी तो मैने इन्हे कहा की एसे लोग तो गजब और निराले होते है।
लोग निराले होते है(कविता)
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छु लेते है जो दर्द किसी का
लोग निराले होते है
जो साथ रहे पर साथ ना दे,
ये अजब सी बाते लगती है
साथ देने पर भी दिल को दुखाये ,
लोग निराले होते है
छुलेते है,जो दर्द किसी का
लोग निराले होते है...
चलते- चलते जो राहै बदले ,
मोड़ पे बाते होती है
अनजाने में फिर मिल गए,
ये सोच के क्यों ये हस्ते है
हम छोटे है एहसास ये दे,
ये उनकी अकड़ ही दिखती है
छुलेते है,जो दर्द किसी का
लोग निराले होते है।
पलपल जीने ना हमको दे ये
केसी आदत लगती है
इंसान के रूप में ये हमे डराए,
ये शक्ल भी अजीब ही लगती है
बिना किसी के ये हक आजमाए
ये थानेदार क्यों बनती है।
छुलेते है जो दर्द किसी का
लोग निराले लगते है।
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कविता का भावार्थ
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इस कविता का भावार्थ यही है कि,अहंकार का दामन छोड़कर चलिए क्युकी अगर उसने अपना असली रूप दिखाया तो सब यही रह जाएगा ,कुछ लोगो के निराले पन के कारण उनके आसपास के वातावरण को जो नर्क बनाते है,वो भी उसकी नजर में आते हैं.....इस बात को ध्यान में रखकर चलिए ..।
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धन्यवाद🙏कविता यादव🙏
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